अरुणिमा सिन्हा की पूरी कहानी [ARUNIMA SINHA FULL STORY]

अरुणिमा सिन्हा की पूरी कहानी [ARUNIMA SINHA FULL STORY]


चेतक मस्तिष्क अवचेतन मस्तिष्क


मैं आज आपके सामने ऐसा महत्वपूर्ण विषय लेकर आया हूं. जो सभी पुरुष महिला बच्चे तथा वृद्ध पुरुषों को खूब आत्मविश्वास से भरता है.

जी हां मैं एक कहानी लेकर आया हूं. जो किसी भी व्यक्ति मनुष्य इंसान को यह सोचने पर मजबूर कर सकता है. उसके दिमाग की शक्ति कितनी है और वह उसका इतनी कम मात्रा में उपयोग कर रहा है.
क्या आप जानते हैं? हमारा दिमाग दो भागों में बटा हुआ है जिसमें पहला चेतक मस्तिष्क दूसरा अवचेतन मस्तिष्क है. चेतक मस्तिष्क हमारे दिमाग का मात्र 10% उपयोग करता है जबकि हमारा अवचेतन मस्तिष्क जो हमारे सोने के बावजूद भी परस्पर जागते रहता है जिसकी सहायता से हम सपने देखते हैं वह हमारे दिमाग का 90% उपयोग करता है.
अर्थात कोई मनुष्य अपने दिमाग में एक बात को घर कर ले तथा अपने आप को हमेशा उस बात के लिए तैयार रखें खुद को हमेशा यह याद दिलाएं. कि उसे अपनी जिंदगी से क्या चाहिए? वह क्या करना चाहता है? वह क्या बनना चाहता है? उस पर वह दिन प्रतिदिन थोड़ा सा ही काम करें तो उसे वह चीज अवश्य मिल जाती है.
जब हम कोई बात बोलते हैं या करते हैं तब हमारा चेतक मस्तिष्क उन बातों को ग्रहण करता है और उसी बातों को बार बार हम दोहराते हैं उस काम को हम बार बार करते हैं तो हमारा चेतक मस्तिष्क उन सारे काम या बातों को हमारे अवचेतन मस्तिष्क में पंजीकृत होने के लिए भेज देता है और जब उस काम को या उस बात को हम बार-बार करते हैं तो हमारे आसपास का वातावरण भी उस काम या बात के हिसाब से ढलना चालू हो जाता है. जिससे हमें उन चीजों को पाने में सफलता मिलती है जो हम सोच रहे हैं जो हम कर रहे हैं,

ऐसी ही एक कहानी है अरुणिमा सिन्हा नाम की एक महिला की.


अरुणिमा सिन्हा


अरुणिमा सिन्हा का जन्म 20 जुलाई 1988 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर में हुआ था आपकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश में ही हुई थी.
जी हां यहां ध्यान रखिएगा कि मैं यहां अरुणिमा सिन्हा के प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा या ग्रेजुएशन की शिक्षा उनके बारे में बायोग्राफी नहीं लिख रहा हूं. मैं यहां लोगों को यह बताना चाहता हूं कि अरुणिमा सिन्हा ने अपनी जिंदगी में ऐसा क्या कर दिया? कि आज लोग उसे जानते हैं.
पहले यह बात जानते हैं, अरुणिमा भी आम महिलाओं की तरह एक आम महिला है. उनका भी हम लोगों की तरह एक सामान्य सी इच्छाएं थी. पढ़ाई लिखाई उसके बाद एक बढ़िया नौकरी उसके बाद स्थाई रूप से अपना जीवन यापन करना. सामान्यतः यही होता है एक मध्यम वर्गीय परिवार के लोगों की इच्छाएं. अरुणिमा एक मध्यम वर्गीय महिला थी तथा उसका भी और लोगों की तरह ही यही सारी इच्छाएं थी.

मगर प्रकृति को कुछ और ही मंजूर था जो अरुणिमा की पूरी जिंदगी को बदलने वाला था.
12 अप्रैल 2011 को लखनऊ से दिल्ली इंटरव्यू के लिए अरुणिमा ट्रेन में सफर करते जा रही थी उस ट्रेन की उस बोगी में कुछ 3-4 लुटेरे घुस आए तथा बोगी मैं उपस्थित सभी लोगों के पास से कीमती वस्तु छीनने लगे और जब अरुणिमा के पास आए तो उन्होंने गले में सोने की चेन पहनी रखी थी जिसे वे लुटेरे छीनना चाह रहे थे मगर अरुणिमा ने इस बात का विरोध किया तथा लुटेरों को सोने की चेन देने से मना कर दिया. गुस्से में लुटेरों ने चलती ट्रेन से अरुणिमा सिन्हा को फेंक दिया
उनका पैर पटरी से जा टकराया तथा वहीं दूसरे साइट से भी ट्रेन आ रही थी. उसका एक पैर ट्रेन की पटरी में आकर कट गया तथा दूसरे पैर की हड्डियां चकनाचूर हो गई. उन्हें दर्द तो बहुत हो रहा था मगर उन्हें यह नहीं पता था कि उनका एक पैर कट गया है तथा दूसरा पैर की हड्डियां टूट गई है. कुछ देर बाद उन्होंने अपने थाई को उठाकर देखा तो नहीं पता चला के उनका पैर कट चुका है तथा दूसरे पैर की हड्डियां छोटे छोटे पत्थरों से टकराकर जींस से बाहर आ रहे हैं. फिर भी उनका चेतक मस्तिष्क कार्य कर रहा था.
लगभग 49 ट्रेने वहां से होते हुए गई अरुणिमा वही पड़ी हुई थी उनका पैर कट गया था तथा वह खड़ी नहीं हो पा रही थी.
सुबह हुआ आसपास के गांव वालों ने अरुणिमा को देखा तथा उन्हें तुरंत अस्पताल ले गए. यह सारी घटना दिल्ली के पास उत्तर प्रदेश बरेली की है. बरेली के डॉक्टर ने उनकी हालत को देखा तथा उन्हें जिला अस्पताल भेज दिया गया.
जिला अस्पताल में जब उनका ऑपरेशन होने वाला था तब अस्पताल में ना एनेस्थिसिया थी, ना खून था, ना ही आक्सीजन था. इस हालात में कैसे किसी का ऑपरेशन किया जाए? तब अरुणिमा सिन्हा ने कहा- सर जब मेरा पैर कटा था मैंने बर्दाश्त किया, 7 घंटे पटरी पर अपने कटे पैर के साथ बिताए वह मैंने बर्दाश्त किया. अभी तो आप मेरे अच्छे के लिए मेरा पैर काट रहे हैं आप काटिए बिना एनेस्थिसिया के इसे भी मैं बर्दाश्त करूंगी.


माउंट एवरेस्ट क्लेम


यह बात अरुणिमा की सुनकर ऑपरेशन के लिए आए हुए प्रमुख डॉक्टर ने उनके सर पर हाथ फेरा तथा पूरी ऑपरेशन टीम को कहा- परिवार वाले जब आएंगे तब आएंगे मगर अभी इसका ऑपरेशन तथा खून पूरी तरह से मुहैया कराना जरूरी है. उस डॉक्टर ने अरुणिमा को एक यूनिट खून दिया तथा एक सफल ऑपरेशन हो पाया. जब बिना एनेस्थिसिया की अरुणिमा के पैर काटे जा रहे थे तब उन्हें पूरी तरह से यह पता चल रहा था कि उनके पैर उनके शरीर से अलग किया जा रहा है. जिला अस्पताल से लखनऊ ट्रामा सेंटर तथा लखनऊ ट्रामा सेंटर से एम्स हॉस्पिटल में भेजा गया. लगभग 4 महीने तक हॉस्पिटल में रहने के बाद जब लोग यह सोचते हैं कि मैं अपने जिंदगी में क्या करूंगा या क्या करूंगी? तब उन्होंने खुद यह सोचा कि अगर भगवान ने मुझे इतनी मुश्किल इतनी तकलीफ देने के बाद भी अभी तक जीवित रखा है. इसका मतलब यह है कि मुझे अपने जीवन में कुछ बड़ा करना है. कुछ तो करना है जिससे मेरी जिंदगी अपने अलावा दूसरों के भी काम आए.
तब उन्होंने यह निश्चय किया मैं माउंट एवरेस्ट क्लेम करूंगी. यह निश्चय उन्होंने हॉस्पिटल के उस बेड पर लेटे लेटे किया परंतु बोलने और करने में बहुत अंतर होता है एक ऐसी लड़की जिसे आर्टिफिशियल पैर भी नहीं लगा था दूसरे पैर में रॉड पड़ी हुई थी वह लड़की सोच रही थी कि मैं माउंट एवरेस्ट क्लेम करूंगी. इसके लिए उन्होंने बहुत से लोगों से बात की कि मुझे माउंटेन क्लेम करना है. बहुत से लोगों ने कहा कि अरुणिमा तुम यह क्या कर रही हो तुम माउंट एवरेस्ट क्लेम करोगी पहले अपनी हालत देखो तुम ठीक से चलने की हालत में नहीं हो और तुम माउंट एवरेस्ट क्लेम करोगी.
ऐसे बहुत से नेगेटिव बातें अरुणिमा को सुनने को मिला पर अरुणिमा उनकी बात सुनने के बाद भी रुकी नहीं. अपना निश्चय एवरेस्ट के लिए बना लिया था जिसे उन्हें पूरा करना था.
ऐसे ही नेगेटिव और पॉजिटिव बातें करने वाले हमारे आसपास होते हैं अगर कोई व्यक्ति कहता है कि तुम यह नहीं कर सकते हो? तो इसे पॉजिटिव लेना चाहिए ना कि नेगेटिव. वह व्यक्ति ऐसा इसलिए कह रहा है कि तुम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वह व्यक्ति खुद नहीं कर सकता इसलिए लोगों को यह बता रहा है कि मैं नहीं कर सकता तो तुम क्या कर सकते हो. तुम भी नहीं कर सकते हो.
ऐसी ही कुछ चीजें अरुणिमा के साथ हुई. जो उन्हें नेगेटिव बातें बोलते थे अरुणिमा उनका पलट कर जवाब नहीं देती थी उन्हें पॉजिटिव लेती थी. उनकी बातों को पॉजिटिव तरीके से समझने की कोशिश करती थी.
जब कोई व्यक्ति सहमत नहीं था अरुणिमा की बातों से. तब अरुणिमा के बड़े भाई ने उनकी पूरी तरह मदद की. उन्होंने कहा तू एवरेस्ट क्लेम करना चाहती है तो तू कर सकती है. मैं पूरी तरह से तेरे साथ हूं.
लेकिन माउंटेन क्लेम करना बहुत महंगा गेम है. बहुत से लगे खर्च भी नहीं कर सकते 30 से 40 लाख रूपय. लोगों ने एक साथ 30 से 40 लाख रूपय देखा भी नहीं है मैंने खुद ने भी नहीं देखा है तो दूसरों की बात क्या कहूं. मगर हां माउंट क्लेम करना एक बहुत ही महंगा गेम है. लेकिन अरुणिमा का सपना था कि वह माउंट क्लेम करें.
कहते हैं ना- रास्ता जहां तक दिख रहा है वहां तक तो चल, आगे का रास्ता वहां जाने के बाद दिखाई देने लगेगा.
ऐसा ही कुछ सिद्धांतों लेते हुए अरुणिमा आगे बढ़ी.


Bachendri Pal से मिले


हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद वह Bachendri Pal से मिले. जब अरुणिमा एम्स से डिस्चार्ज हुई तो उनके पास कोई रिजर्वेशन नहीं था तब उन्होंने अपने भाई को कहा हमारे पास रिजर्वेशन नहीं है हम कैसे जाएंगे Bachendri Pal से मिलने. तब उनके भाई ने कहा अरुणिमा तुम चिंता मत करो हम जरूर जाएंगे. पहली बार हैंडीकैप कंपार्टमेंट में बैठकर इससे पहले अरुणिमा को यह पता नहीं था ट्रेन में हैंडीकैप कंपार्टमेंट भी होता है. उन्हें उस समय बहुत रोना आया कि अब ऐसा समय आ गया है की हैंडीकैप कंपार्टमेंट में बैठकर हम सफर कर रहे हैं. सुबह जब जमशेदपुर पहुंचे तो उन्होंने Bachendri Pal को कॉल किया और कहा कि मैम हम आ गए हैं कहां आना है Bachendri Pal आश्चर्य जनक ढंग से कहा बहुत से लोग कहते हैं कि हम माउंट एवरेस्ट क्लेम करना चाहते हैं मगर कोई आता नहीं है.

Bachendri Pal ने उन्हें अपने ऑफिस बुलाया तथा अरुणिमा की हालत को देखकर उनसे पूछा की तुम्हें समझ में आ रहा है तुम क्या कह रही हो तरुणी मैंने कहा हां मुझे समझ में आ रहा है मैं क्या कह रही हूं और मैं वह करना चाहती हूं.
Bachendri Pal की आंखों में आंसू आ गए तथा Bachendri Pal ने कहा तुमने एवरेस्ट सबमिट कर दिया है बस लोगों को दिनांक पता लगना बाकी है.
Bachendri Pal ने एवरेस्ट के लिए अरुणिमा का नाम भरा. तथा अरुणिमा की ट्रेनिंग प्रारंभ हुई. ट्रेनिंग के समय उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा काफी भी नेगेटिव बातों का सामना करना पड़ा पर वह पीछे नहीं हटी. वह डटकर अपने सपने को पाने के लिए मेहनत करने लगी. ट्रेनिंग कंप्लीट हुआ. उन्हें एवरेस्ट चढ़ना था तथा अरुणिमा को एक पार्टनर दिया गया.
अरुणिमा के पार्टनर ने अपने मेंटर्स को कहा कि 1 विकलांग लड़की के पार्टनरशिप में मुझे अपनी जान एवरेस्ट में नहीं गवानी है तब अरुणिमा ने अपने पार्टनर को कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा तुम मेरे ऊपर भरोसा रखो मैं ऐसा कुछ होने ही नहीं दूंगी. उनका पाटनर जैसे-तैसे कर रेडी हुआ तथा उनकी टीम एक साथ एवरेस्ट की चढ़ाई चढ़ने के लिए आगे की ओर निकले. ऊंचाई चढ़ते हुए उनकी टीम के कुछ सदस्य ने हार मान कर पीछे की ओर चले गए कुछ लोग ऑक्सीजन की कमी तथा खाई की वजह से अपनी जान को त्याग दिया. यह सब देख कर किसी का भी आत्मविश्वास लड़खड़ा जाएगा. मगर वहां भी अरुणिमा का आत्मविश्वास बना रहा.
कुछ ही दिनों के सफल प्रयास के बाद अरुणिमा एवरेस्ट समिट करने की कुछ ही कदम की दूरी पर खड़ी थी. तभी उनका ऑक्सीजन सिलेंडर खत्म होने की कगार पर आ गया था. उनका पार्टनर सिलेंडर के अभाव में उन्हें अकेला छोड़ कर चला गया. अरुणिमा का दृढ़ निश्चय था कि मुझे एवरेस्ट सबमिट करना है और ऑक्सीजन की कमी के बाद भी उन्होंने एवरेस्ट की चोटी में भारत का तिरंगा लहराया और अपना एवरेस्ट सबमिट किया.

    यह थी अरुणिमा सिन्हा की पूरी कहानी


अरुणिमा सिन्हा के जीवन से सीखने को कुछ मिले ना मिले परंतु एक चीज़ सीखने को जरूर मिलती है की अगर हमारा आत्मविश्वास सही है अडिग है तो हम हर एक चीजों को प्राप्त कर सकते हैं. श्रीमद्भागवत गीता में भी यह बात कही गई है. कि दुनिया में कोई भी चीज़ नामुमकिन नहीं है बस उसे पाने की सच्चे दिल से कामना की जाए.
ट्रेन से गिरने के बाद और एक पैर टूट जाने के बाद तथा दूसरा पैर पूरी तरह चकनाचूर होने के बाद जहां लोग यह सोचते हैं कि मेरी जीवन का अब कोई लक्ष्य नहीं रह गया है मेरा जीवन अब खत्म हो गया है मेरा जीवन मृत्यु के समान है अपने घरवालों पर अपने लोगों पर एक बोझ के अलावा और कुछ नहीं रह गया हूं. वही अरुणिमा सिन्हा ने इतिहास रच डाला.
किसी ने सही कहा है- इंसान शरीर से विकलांग नहीं होता, दिमाग से विकलांग होता है. पांव की मोच और छोटी सोच इंसान को कभी आगे बढ़ने ही नहीं देता है.
दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इतिहास रटना नहीं है इतिहास रचने पर भरोसा करते हैं और अरुणिमा सिन्हा ने इतिहास रचने में भरोसा किया.

यह बात वैसे कहता नहीं हूं मगर आज कह रहा हूं. अगर आपको यह लेख पसंद आया तो कृपया करके लाइक करें शेयर करें उन्हें जिन्हें इसकी जरूरत है जो अपनी लाइफ में कुछ करना तो चाहते हैं मगर कुछ कर नहीं पाते उनकी सोच उन्हें रोक के रख देती है. इस लेख से अगर उन्हें कोई मदद मिली तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात होगी. इसलिए इसे शेयर करें.


सफलता की पहली और अंतिम सीढ़ी[STAIRS OF SUCCESS]

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