मार्टिन लूथर किंग जूनियर अमेरिका का गांधी[MARTIN LUTHER KING JR. GANDHI IN AMERICA]

मार्टिन लूथर किंग जूनियर अमेरिका का गांधी[MARTIN LUTHER KING JR. GANDHI IN AMERICA]


यदि तुम उड़ नहीं सकते तो दौड़ो, दौड़ नहीं सकते तो चलो और यदि तुम चलो भी नहीं सकते तो रेगो लेकिन तुम जो भी करो तुम्हें आगे बढ़ते रहना होगा.
यह बात मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कही है, यह बात हमें याद दिलाती है कि हमारी लाइफ में जो हो रहा है यह जो होने वाला है फिर भी अब रुक नहीं सकते और रुकना भी नहीं चाहिए.
क्योंकि चलते रहना लाइव को खुशी से जीने का बेहतर तरीका है.
अमेरिका के गांधी कहे जाने वाले डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग जूनियर के बारे में जानते हैं.


15 जनवरी 1929 को अमेरिका के अटलांटा मैं जन्म मार्टिन लूथर किंग जूनियर आगे चलकर एक पादरी होने के अलावा एक ग्रेट लीडर बने. जिन्होंने अमेरिका का रुख बदल कर रख दिया सही और गलत में फर्क करना तो हम सभी जानते हैं लेकिन गलत के खिलाफ आवाज उठाने वाला ही होता है रियल लाइफ हीरो. और ऐसे ही एक महान व्यक्ति थे डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग जूनियर.
मार्टिन लूथर ने अमेरिका में अफ्रीकन अमेरिकन के साथ रंग की वजह से होने वाले भेदभाव के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की. और महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने वाले इस महान नेता ने नस्लभेद का खुलकर विरोध किया. मार्टिन लूथर किंग ने इस जंग को जीतने के लिए गांधीजी का बताया हुआ सच्चाई और हिंसा का रास्ता चुना. इससे यह बात साबित होती है कि सच्चाई के लिए लड़ाई दुनिया के किसी भी कोने में हो उसका असर सभी जगह पड़ता है.
साउथ अफ्रीका में महात्मा गांधी को अपने रंग की वजह से अपमान सहना पड़ा था उसके बाद उन्होंने साउथ अफ्रीका से रंगभेद को किस तरह बाहर निकाला यह हम सब जानते हैं.
ऐसा ही एक इंसिडेंट मार्टिन लूथर किंग जूनियर की लाइफ में हुआ तो उनका भी वही रिएक्शन था जो गांधी जी का था यानी ज्यादती सहना नहीं है.1955 में मोंटगोमरी की एक बस में सफर के दौरान एक गोरे पैसेंजर को सीट ना देने की वजह से जब एक अश्वेत महिला को गिरफ्तार कर लिया गया तो इस वाक्य ने 26 साल के युवा मार्टिन लूथर किंग के अंदर इस नस्लभेद को मिटा देने की चिंगारी जला दी और इसके विरोध में पूरे 381 दिनों तक चले सत्याग्रही आंदोलन के बाद अमेरिकी बसों में काले गोरे के लिए अलग-अलग सीट रखने का प्रावधान खत्म कर दिया गया.


इस तरह डॉक्टर मार्टिन लूथर के एक लीडर बनने की शुरुआत हुई.1959 में उन्होंने भारत की यात्रा की और गांधीजी के उसूल और अपने नेक इरादे के साथ लाइफ में इनका गोल ना तो अमीर बनना था और ना ही महान. उनकी चाहत तो बस इतनी थी कि अमेरिका में रहने वाला हर एक शख्स एक दूसरे को अपना भाई समझे और सभी को उनका अधिकार मिले. अपनी इन कोशिशों और अमेरिका को एक महान देश के रुप में देखे जाने का सपना समय के साथ-साथ सच होता गया. उनके ड्रीम अमेरिका की राह में उन्हें काफी मुश्किलों से गुजरना पड़ा. कई तरह के विरोध सहने पड़े, प्रदर्शन करने पड़े तथा जेल भी गए. लेकिन उनका सपना एक पल के लिए भी उनकी आंखों से ओझल नहीं हुआ और जब 1963 में वाशिंगटन डीसी में स्कूलों नौकरियों में रंगभेद करने वाले नीतियों के विरोध में निकाला गया मार्च सफ़र रहा तो मार्टिन की आंखों का वह सपना अपने स्पीच के जरिए दुनिया के सामने आया जिसमें उनके सपनों का अमेरिका बसता था. उनकी उस स्पीच का नाम था “‘ I have a dream”‘ जिसमें उन्होंने कहा था कि मेरा सपना है कि एक दिन चार मेरे चारों छोटे बच्चे एक ऐसे देश में रहेंगे जहां उनका आकलन उनके चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र के बल पर किया जाएगा. उनके कहे गए यह शब्द आज भी दोहराया जाते हैं और आज भी मार्टिन लूथर किंग की कही बातों में उतनी ही सच्चाई और उतनी ही कोशिश सुनाई देती है.
दुनिया में दर्ज महान स्पीकर्स में एक नाम मार्टिन लूथर किंग जूनियर का भी है कि उनका यह ड्रीम अमेरिका जरुर एक दिन हकीकत बनेगा.
इस रियल लाइफ हीरो की कोशिशों से अमेरिका ने एक आदर्श देश बनने की राह भी पकड़ ली. इस ग्रेट पर्सन को टाइम्स ऑफ इंडिया ने 1963 में उस वर्ष का मैन ऑफ द ईयर चुना और जब 1964 में विश्व शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से जब उन्हें नवाजा गया तब वे केवल 35 साल के थे और इतिहास के पन्नों में सबसे कम उम्र के सम्मान पाने वाले पहले व्यक्ति बन गए.
मार्टिन लूथर को अपना सपनों का अमेरिका देखने का अवसर ज्यादा दिनों तक नहीं मिला. जब अपने होटल के बालकनी में खड़े थे तो महात्मा गांधी की तरह ही उन्हें भी गोली मार दी गई 39 साल की उम्र में एक ऐसा लीडर चला गया जिसने बड़ी छोटी सी उम्र में ही अमेरिका को उनके सपने दे दिए.
उनका कहना था आप के ऊपर तब तक कोई सवार नहीं हो सकता जब तक कि आपकी कमर झुकी नहीं हो. इसलिए अपनी कमर सीधी करो और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम पर जुट जाओ.


नेल्सन मंडेला गांधी जी की राह पर [NELSON MANDELA GANDHI IN AFRICA]

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